सोमवार, 25 जून 2007

हुसेन के चित्रों में ही अश्लीलता क्यों दिखती है?

मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों पर इन दिनों फिर हंगामा है। हरिद्वार की एक अदालत में उनकी प्रॉपर्टी जब्त करने के आदेश दे दिए हैं क्योंकि वह बार-बार बुलाए जाने के बावजूद अदालत में हाजिर नहीं हो रहे थे जहां हिंदू देवी-देवताओं की अश्लील तस्वीरें बनाने के आरोप में उन पर मुकदमा चल रहा है। ऐसे ही न जाने कितने मुकदमे हुसेन के खिलाफ देश भर में चल रहे हैं।

हम यहां मुकदमों की चर्चा न कर उन तस्वीरों की चर्चा करेंगे जो कुछ लोगों को अश्लील लगती हैं। अब सवाल यह है कि जब हुसेन किसी देवी की निर्वस्त्र तस्वीर बनाते हैं तभी वह क्यों लोगों को आपत्तिजनक लगती है ? जब कोई हिंदू दुर्गा की ऐसी ही तस्वीर बनाता है और वह बंगाल की प्रतिष्ठित पत्रिका देश के कवर पर छपती है तो क्यों कोई उस हिंदू चित्रकार के खिलाफ केस नहीं करता ?

यदि नग्नता ही अश्लीलता है तो सारे भारत में स्थित काली के सारे मंदिरों में क्यों नहीं ताले लगा दिए जाते ? जिन-जिन घरों में काली की तस्वीरें हैं, उन परिवारों को बहिष्कृत क्यों नहीं किया जाता ? बल्कि उस चित्रकार, मूर्तिकार या दार्शनिक कवि को खोज कर उसकी लानत-मलामत क्यों नहीं की जाती जिसने काली का यह रूप रंगों या शब्दों में बनाया ?


काली ही क्यों, शिव को भी क्यों नहीं इस सफाई अभियान में शामिल किया जाए ? काली तो फिर भी एक निर्वस्त्र देवी का मूर्त रूप है, शिवलिंग की कल्पना तो उससे भी दो कदम आगे है। वैज्ञानिक रूप से ईश्वर का यह भौतिकतम प्रतीक लिंग और योनि का ही प्रतिमांकन है। आरंभ में जब जीवन के रह्स्य को ढूंढने की कोशिश हुई तो लिंग की जीवनदायिनी शक्ति को देखते हुए कई आदिम संप्रदायों ने उसे ईश्वर का दर्ज़ा दे दिया और मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने लगे। यदि अश्लीलता की आंखों से देखा जाए तो ईश्वर का इससे अश्लील चित्रण भला क्या होगा ! लेकिन क्या हम उसे अश्लील मानते हैं ? काली ओर शिव के देवालय ही क्यों, देश के अनगिनत दूसरे मंदिरों में संभोगरत देवी-देवताओं की मूर्तियां लगी हुई हैं (देखने के लिए आप गूगल सर्च विंडों में Erotic sculptures temples टाइप कर इमेजेज़ को क्लिक कीजिए या यहां क्लिक कीजिए)। तो क्या उन सबको हथोड़ा मारकर नष्ट कर दिया जाए ?
पुराणों में शिव सहित हिंदू देवी-देवताओं पर जाने क्या-क्या लिखा गया है, लेकिन आज तक किसी ने उस पुराणों को जलाने का आह्वान नहीं किया। बिहारी और विद्यापति ने कृष्ण-राधा प्रसंगों का ऐसा श्रृंगारिक वर्णन किया है जिसे आसानी से अश्लील कहा जा सकता है लेकिन उनके साहित्य पर प्रतिबंध की आवाज़ कभी नहीं उठी। फिर हुसेन के चित्रों पर ही शोर क्यों मच रहा है ? सिर्फ इसलिए कि वह मुसलमान हैं वरना कई हिंदू चित्रकार ऐसे ही चित्र बना रहे हैं और मैगज़ीनों के कवर पर छप रहे हैं, लेकिन उनपर कोई बवाल नहीं मचता।
टिप्पणी के आखिर में मैं केवल एक बात पूछूंगा - मां काली को देखकर किसे लग सकता है कि वह एक अश्लील मूर्ति है ? किसी भक्त को तो कदापि नहीं लगेगी। शिवलिंग को देखकर किसे रतिक्रिया की याद आती है ? किसी भक्त को तो नहीं आएगी। यदि मन में धार्मिक भाव हैं तो कभी भी निर्वस्त्रता अश्लीलता का भाव दे सकती। और यदि मन में अश्लीलता है तो पूरी तरह ढका हुआ शरीर भी किसी को उत्तेजित कर सकता है।


हुसेन के चित्रों को देखकर मुझे कभी भी नहीं लगा कि वे अश्लील हैं क्योंकि कभी उन्हें देख्कर कामुक भाव नहीं जागा। हिंदू मंदिरों में शिव-पार्वती की मिथुन मूर्ति बनानेवाले कलाकार ने जिस कल्पना, आस्था और श्रम के साथ वह प्रतिमा गढ़ी होगी और जिसे देख मैं चमत्कृत होता हूं, हुसेन की सरस्वती के देखकर भी मुझे वैसा ही लगता है। कुछ लोगों को उन चित्रों में अश्लीलता इसलिए दिख रही है, कि वे चित्र को अकेलेपन में नहीं, कलाकार के नाम से जोड़कर देख रहे हैं...


(यह लेख नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है जहां कई पाठकों ने उस पर अपनी टिप्पणियां की हैं।
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